Sunday, November 23, 2014

हमने भी डूब के उस पार जाने की कोशिश की थी
डूबने को मुझपर एक और दिल का बोझ तो हो..


वक़्त ने कर दिया बुत हर ज़र्रा मेरी दुनिया का
किसको दूँ मैं अज़ान कोई निगाह-ए-बान तो हो..


कहना तो चाहता हूँ मैं भी हर लफ़्ज़ तन्हाई के
मैं भी तोड़ू ख़ामोशी तू मेरा मोहताज़ तो हो..


आज से है वादा-ए-ज़िस्त मेरा तेरी मसरूफीयत से
पुकारेंगे ना हम भी दिन चाहे क़यामत का ही हो..


चाँद के तो होते हैं सभी चकोर इस दुनिया में
मुझे महसूस तू करना जब आसमान वीराना हो..


ख़्वाहिशों को तेरी दी है साँसों की सरगम अपनी
ग़म ना करना मेरे सीने में जो कोई साज़ ना हो..


"आशी" इस बाज़ार में तुम बहुत चीख़ लिए
दिल की तब ही कहना जब कोई कारोबार ना हो..

"आशीष मौर्य "

Saturday, November 1, 2014

"आहत ह्रदय"

       "आहत ह्रदय"

दीन-दुनिया से मूर्छित रहा मैं
निष्कपट सा ऊर्जित रहा मैं
व्यर्थ होगा जानकर भी
ख़ुद को समर्पित कर गया मैं

फ़िक्र सबकी और बेफ़िक्र रहा मैं
क्रन्दन में जब अनसुना रहा मैं
बेबात है यह जानकर भी
रोते-रोते हँस गया मैं

अदृष्ट अप्रिय अवांछित सहा मैं
पर सदैव आशान्वित रहा मैं
भंगुर है सब जानकर भी
स्वप्न सुनहरे बुन गया मैं

निर्णयों में अनिर्णित रहा मैं
अपनों में ही दिग्भ्रमित जिया मैं
अग्राह्य हूँ यह जानकर भी
ख़ुद को प्रकट कर गया मैं

साथ सभी के चलता रहा मैं
अपनी राह अकेला बढ़ा मैं
मृग मरीचिका है जानकर भी
प्यास अपनी पीता गया मैं

एक पथिक सा बनता गया मैं
अकथित सा सुनता गया मैं
धार है यह जानकर भी
आहत ह्रदय से बढ़ता गया मैं
आहत ह्रदय से बढ़ता गया मैं..


"आशीष मौर्य"

Monday, March 17, 2014

वाह री दुनिया वाह
ये कैसी तेरी चाह

पिंजरों में बंद हैं सपने
हर कलरव में हैं आह..
पंछियों  के स्वतंत्र स्वरों को
बाँधने की कैसी चाह

वाह री दुनिया वाह
ये कैसी तेरी चाह

कुदरत बिन माँगे हैं देती
क्यों काटे इसकी बाह...
अपने ही अरथी को ढोए
तू चला कौनसी राह

वाह री दुनिया वाह
ये कैसी तेरी चाह

अपनों में तू खुद को भूला
धूप में बना ठंडी छाह...
मुश्किल में तू जो पुकारे
कौन थामेगा तेरी बाह

वाह री दुनिया वाह
ये कैसी तेरी चाह

प्रेम वचन सब हुए पुराने
गुजर चुके वो दिन माह...
मैं बस मेरी करनी जानू
सुकर्म तेरे सब स्वाह

वाह री दुनिया वाह
ये कैसी तेरी चाह


"आशीष मौर्य"